कितनी और समीक्षा होगी?
कितनी और परीक्षा लोगे?
सदियों से तुम पति बने हो
कब तुम मेरे मित्र बनोगे??


आगे आगे तुम चलते हो
आँख मूँद मैं चलती पीछे
कदम से मेरे कदम मिला कर
कब तुम मेरे संग चलोगे??


कितनी और परीक्षा लोगे?
कितनी और समीक्षा होगी?


शब्दों को तुम समझ ना पाते
मौन के भी तुम अर्थ लगाते
मेरे मन की बात समझ के
कब मेरी भाषा समझोगे??


मेरा भी अपना एक मन है
देह के बाहर भी जीवन है
अपनी कैद में रख कर मुझको
कितना और कब तक परखोगे??


कितनी और समीक्षा होगी??
कितनी और परीक्षा होगी??

(एक मित्र द्वारा जोड़ी गयी कुछ पंक्तियाँ )
युग युग से अग्नि पर चली हूँ
रेखाओ से मैं ही बंधी हूँ
संग हर पल हर क्षण कब तुम रहोगे
सीमाओ से परे कब तुम मुझे करोगे??

16 comments:

Pradhuman Singh Kushwah said...

Great yaar
simply you rocks :)

Abhishek said...

महत्वपूर्ण प्रश्न के साथ सशक्त शुरुआत. स्वागत.

ललितमोहन त्रिवेदी said...

नारी मन की गहन कंदराओं से उठते प्रश्नों को रेखांकित करती एक सशक्त रचना ! बहुत खूब !आपकी ओल्ड पोस्ट भी पढ़ी !अच्छा लिखती हैं आप ! लेखन में निरंतरता बनाये रखें !

प्रकाश गोविन्द said...

बहुत ही मासूमियत भरी रचना

सार्थक लेखन !

यह कविता अपने आप में
प्रश्न और उत्तर भी
साथ ही सुझाव भी !

मेरी हार्दिक शुभकामनाएं !!!

[इस वर्ड वैरिफिकेशन की प्रक्रिया को हटा दें,
इससे प्रतिक्रिया देने में अनावश्यक परेशानी
होती है ! ]

Pratap said...

शब्दों को तुम समझ ना पाते
मौन के भी तुम अर्थ लगाते
मेरे मन की बात समझ के
कब मेरी भाषा समझोगे??

बहुत ही हृदयस्पर्शी रचना है.बहुत ही ज्वलंत प्रश्न है.

JHAROKHA said...

Bahut hee sahaj,saral aur sundar shabdon men apne apnee bhavnayen likhi hain.badhai.kabhee mere blog par ayen.
Poonam

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर...आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है.....आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे .....हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

अशोक मधुप said...

बहुत अच्छी भावपूर्ण कविता। बधाई
हिंदी लिखाड़ियों की दुनिया में आपका स्वागत। खूब लिखे ।अच्छा लिखे। हजारों शुभकामनांए।

दिगम्बर नासवा said...

मेरा भी अपना एक मन है
देह के बाहर भी जीवन है
अपनी कैद में रख कर मुझको
कितना और कब तक परखोगे??

बहुत सुंदर, बहुत अच्छी अभिव्यक्ति है सशक्त रचना
समाज से जवाब मांगती, भाव पूर्ण कविता

bhoothnath(नहीं भाई राजीव थेपडा) said...

इस रचना ने तो दिल को हिला दिया.......गनीमत है कि इस मामले में मैं शुक्रगुजार हूँ.....और पहले पति ना होकर मित्र ही हूँ........जो लोग नहीं हैं वो इस बाबत गम्भ्र्र्ता से सोचें.........वरना...............!!

आनंदकृष्ण said...

आज आपका ब्लॉग देखा बहुत अच्छा लगा. मेरी कामना है की आपके शब्दों को नए रूप, नए अर्थ और व्यापक दृष्टि मिले जिससे वे जन-सरोकारों की सशक्त अभिव्यक्ति का माध्यम बन सकें.....
कभी समय निकाल कर मेरे ब्लॉग पर पधारें.
http://www.hindi-nikash.blogspot.com

सादर-
आनंदकृष्ण, जबलपुर.

sanjaygrover said...

Pariksha ki achchhi Samiksha ki hai aapne.

bhoothnath(नहीं भाई राजीव थेपडा) said...

क्यों डरे ज़िन्दगी में क्या होगा?? कुछ न होगा तो तजुर्बा होगा......jis kisi shaayar ki ye pankyiyaan hain....use salaam.....haan jagjit da ne ise gaaya bhi to khoob hai....!!

VisH said...

ur lines are too gooood yaar
keep it up.....keep writting ....plz welcome to my blog .....some thing, some one, sometime etc.

Jai Ho Magalmay Ho

परा वाणी - the ultimate voice said...

रसात्मक और सुंदर अभिव्यक्ति

Pradeep Kumar said...

कितनी और समीक्षा होगी?
कितनी और परीक्षा लोगे?
सदियों से तुम पति बने हो
कब तुम मेरे मित्र बनोगे??
bahut achchhi kavita hai . badhai

apne naam ke anuroop hi kavita likh kar use khoob charitaarth kiya hai .

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